Sunday, January 23, 2022

कहानी का जीवन.

कहानी(यां) मेरे जीवन का बेहद ख़ास हिस्सा रही है या यूँ कहूँ कि जिंदगी को मैंने हमेशा कहानी की तरह ही देखा और जाना है| ऐसी कोई बात जिसका वजूद बहुत ही सीधा -सपाट रहा हो, ऐसा कोई वाकया जो बहुत बार एक ही तरह से सुना हो, मुझे  बहुत बोझिल कर देता है| 
मेरे साथ होते-2 अकसर दो ही बाते रह जाया करती है, या तो कहानी कह दो या तो कहानी सुन लो| इन दो बातो के अलावा जो तीसरी बात हो सकती थी वो थी "या तो कहानी बुन लो"|
मै हमेशा से ही थोड़े आलसी रवैये में रही हूँ तो कहानी बुन ने वाला रास्ता तो पकड़ नहीं सकी| बुन ने में बड़ी मेहनत लगती है इसलिए मैंने कहानियों में बने रहने के लिए एक बड़ा ही आसान रास्ता चुना, प्रार्थना का  रास्ता! 

मंदिर में जाकर एक भगवान की कहानी में गिरकर, पैरो की तरफ सर को झुका कर हाथ फैलाकर, मैंने कहा - 
"क्या ऐसा नहीं हो सकता कहानियाँ मुझे चुन ले! "ऐसा कीजिये मुझे यही वर दीजिये कि कहानियाँ मुझे चुनती रहे और अपने हाथो से मेरे वजूद की किस्म को बुनती रहे| 

कुछ होता है आपके अन्दर जो आपको बताता है कि आप किस मिजाज के इंसान हो, किन-2 जंजीरों से पकडे हुए हो, किन-2 हादसों में जकड़े हुए हो| मुझे बस लगता था कि मुझ में कहानियों के लिए एक पुकार है, इसलिए मैंने मांगी तो बस कहानी (यां)| 

हालाँकि मैंने जब -2 खुद कहानी को लिखना चाहा तो उसने मुझे इस तरह से अस्त- व्यस्त किया कि मैंने तौबा कर डाली... मुझसे नहीं लिखी जायेगी कोई भी कहानी| मुझे कहानी को लिख देने का गुरुर कभी नहीं था बल्कि मुझ में हमेशा उत्सुकता रही ये जानने कि ये कहानी मुझे कैसा लिखेगी, कैसे लिखेगी? 

बहुत बार कहानी ने मुझे अचम्भित किया, उसने मुझे ऐसे लिखा कि मै अपने ही किरदार के चढ़ाव के उतार में उलझ कर खुद को पहचान ना  सकी! कहानी(यों) ने मुझे अगल -2 तरीको में गढ़ा है और फिर उस गठन को पढने में मैंने खुद को मशगूल किया है| 

बस इसी तरह कहानी(यों) के साथ उलझ-2 कर जिन्दगी की दो -चार शामे गुजर जाए, धीरे -2 जिन्दगी अपने अंतिम पड़ाव पर आ जाए और कोई एक कहानी मेरा अंत लिख दे और मुझे चैन की सांस आ जाए... 
                          
      ...तब तक के लिए चलो किसी कहानी से कहा जाए कि सुनो! क्यूँ ना हम में तुम को लिखा जाए|  

    
 


Saturday, July 10, 2021

अगर नहीं पता कि पहुंचना कहाँ है तो सब ठीक है

आप जहां जा रहे है उस दिशा में जाने वाली गाड़ी के इंतज़ार में है, गाड़ी आती है आप उसमें चढ़ जाते है,दो स्टेशन के बाद गाड़ी उल्टी चलने लगती है , आप हैरान होते है, किसी से कुछ पूछते नही और खुद पर ही शक करते है कि शायद आप ही गलत गाड़ी में चढ़ गए होंगे  । आप दो स्टेशन पीछे जाकर फिर से आपके जाने की दिशा वाली गाड़ी में बैठ जाते है और गाड़ी फिर से दो स्टेशन आगे जाके उल्टी  चलने लगती है। अबकी बार आप बगल वाले से पूछ लेते है कि 'ये गाड़ी उल्टी क्यों चल रही है' ? 
बगल वाला इंसान कहता है कि क्योंकि ये गाड़ी तो यहीं तक आती है इसकी डेस्टिनेशन तो यही है, आपको कहाँ जाना है? 

अरे हां! ऐसा भी होता है कि आपकी दिशा में जाने वाली हर गाड़ी, जहां तक आपको जाना है वहां तक तो नही जाएगी कुछ की डेस्टिनेशन बीच मे ही कहीं होती है। 

आप अपनी  कच्ची-पक्की समझ के भरम में इतना गुम होते है कि आपको ये यकीन होता है कि हर उस दिशा में जाने वाली गाड़ी वहीं तक जाएगी जहां तक आपको जाना है, और गाड़ी पर लिखा गंतव्य स्थान पढ़ने का  होश ही नही आता, एक बार नही, दो बार आप करते है ऐसा, और जाने कितनी बार ऐसा करने की संभावना रखते है। 

हालांकि आप ये बार- 2 का आना और जाना के घुमचक्कर पर घूम सकते है , ये भी एक अच्छी चीज है , अगर आपके पास  वक़्त है तो, बहुत बार वक़्त का होना अपने आप ही बोर्ड पर लिखे गंतव्य स्थान पर ध्यान नही जाने देता।  

और कई बार ऐसा लगना कि वक़्त नही है, अपने आप मे एक अलग तरह का भरम हो सकता है? 

पर वक़्त की बात छोड़ देते है और आपकी अपनी बात करे तो, 
जिनको पता होता है कि वो कहाँ जाना चाहते है (सही में पता होता है) वो एक ही बार में गलती सुधार लेते है और अगली बार देख कर गाड़ी में चढ़ते है, और जिन्हें पता नही होता कि असल मे उन्हें पहुंचना कहाँ है ( सही में नही पता होता) वो एक बार, दो बार, पता नही कितनी बार बीना गंतव्य स्थान पढ़े, सिर्फ उस दिशा में जाने जाने वाली गाड़ियों में बैठते रहेंगे और उल्टे लौटते रहेंगे , बशर्ते उनके पास वक़्त खूब हो। 

जीने के अंदाज़ सबके चाहे अलग -2 हुआ करे पर एक वक्त आता है जिसके हाथ मे एक लगाम होती है और वो लगाम खींच कर आपके ध्यान को बोर्ड पर लिखे गंतव्य स्थान को पढ़ने पर ले जाता है।

-Rachna


Sunday, May 16, 2021

शुरू से शुरू करते है ...

मुझे बचाना था किसी चीज को, शुरू से ही | मुझे ठीक  से तो नही पता वो 'शुरू' कहाँ से शुरू होता है पर हाँ जब भी मैं शुरुवात को याद करती हूं तो मुझे दो बड़े -2 पीपल के पेड़ वाला सरकारी स्कूल याद आता है,  जिसके मास्टर ने दाखिला देने का टेस्ट लेने के बाद ये कहा था कि 'इसे किसी इंग्लिश मीडियम स्कूल में डाल दो, यहाँ नही चलेगी, बच्ची बर्बाद हो जाएगी' । ये बात मुझे आज भी यूँ कि यूँ याद आ जाती हैं जरा जोर से गूँजते हुए कि "बच्ची बर्बाद हो जाएगी" , बस उसी वक़्त से मुझे बचाना था किसी चीज को ।  " बच्ची बर्बाद हो जाएगी" ये सुनकर मेरे पापा ने बड़े गुरुर से कहाँ था, मास्टर जी आप दाख़िला दो बच्ची कहीं से भी निकल जायेगी और जो बर्बाद होगी तो कहीं भी हो जाएगी। पापा का गुरुर कुछ भारी सा था , उनके कहने ने  तो नही पर हाँ उस गुरूर ने ठीक उसी वक़्त मुझे किसी चीज को बचाने की जंग में धकेल दिया, बचपन मेरा उसी वक़्त उस पीपल के पेड़ पर लटक गया अब मैं एक जंग का हिस्सा चुकी थी जिसे 'किसी चीज' को बचाना था, बच्ची को बर्बाद होने से बचना था । 

उस वक़्त मुझे ठीक से नही पता था कि बर्बाद होना क्या होता है और बचे रहना क्या होता है।  'किसी चीज' को बचाने से पहले ये तो समझ मे आये  कि बच के निकल जाना होता क्या है? 
बहुत बार ऐसा हो जाता था कि बचे हुए लोग मुझे बर्बाद से लगते थे और बर्बाद लोग कितने बच के निकले हुए लगते थे। मुझे मेरे बचने का मतलब खोजना था। क्योंकि मुझे बचाना ही था खुद को वरना पापा का वो भारी गुरुर मेरे सर पे गिरके मेरा दम निकाल देता। 

पता नही क्यों मुझे उस दिन जब पापा ने गुरुर से मास्टर जी को वो बात कही थी मुझे तब लगा था कि मेरा जन्म तो अभी-2 हुआ है और अब ये जिस चीज का जन्म हुआ है इसे ही बचाना है। उस दिन के बाद से पापा मुझे जन्म देने के बाद बस मुझे मारने के सब इंतजामो में ही लिप्त हो गए थे जैसे कि बस अब उनका काम मेरा इम्तिहान ही लेना बचा हो। मुझे जीने के वो सलीके चुनने थे कि 'मैं 'बची रहूं और  उन्होंने जीने के वो सलीके चुने कि मेरा 'मैं' बाकी ही ना रहे। 
to be continued.....

Friday, September 13, 2019

मैं तुमसे प्यार कर भी लूं, तुम मुझ से कर ना पाओगे.

मैं तुम से प्यार कर भी लूं, तुम मुझ से कर ना पाओगे
फिर होगा यूँ इस बात से , हर बात पे रुलाओगे
मैं तुमसे प्यार करके तुम्हारी आँखों मे झांकूँगी
वहां गहराइयां ना पाके फिर खुद ही को डाँटूंगी
मैं खुद से कहूंगी, ले बता अब कहाँ मैं डूब मरूँ
और अगर जीती रही तो तुमसे प्यार क्यूँ करूँ।
कि मैंने सुना है इश्क़ में तो डूब जाना होता है
खुद को फ़ना करके ही फिर खुद को पाना होता है।
मैं तुमसे प्यार कर भी लूं...... फिर होगा यूँ.........
मैं तुमसे प्यार करके तुम्हारे चेहरे को बांचूंगी
और सीधी कही बात को भी,उलट- पुलट कर जांचूंगी
तेरे आते - जाते भावो में, तेरी रूह के दरवाजे ढूंढूंगी
और बंद दरवाजो से टकरा कर ,फिर खुद ही को मैं कोसूंगी
खुद से कहूंगी ले बता, ये रूह तो दरवाजो के पीछे मौन है
अब किस से प्यार मैं करूँ, यहां मेरा अपना कौन है
कि मैंने सुना है इश्क़ में रूह , रूह को बुलाती है
एक रूह की सदा दूजी को छू के जाती है।
मैं तुमसे प्यार कर भी लूं...... फिर होगा यूँ........

मेरी बातों को सुनके तुम थोड़ा सा मुस्काओगे
और सुकूँ से बैठ कर मुझे हौले से समझाओगे।
अजी छोड़िये भी अब,तुम्हारे ये रूहानी किस्से
ऐसी मोहब्बत रह गयी है,सिर्फ किताबो के हिस्से।
ये बात सुनकर मैं फिर अंदर तक हिल जाउंगी
तुम कह रहे हो ये बात , यकीं नही कर पाउंगी।
तुमसे कहूंगी तो फिर, बन क्यों नही जाते हो किताब
ऐसी मोहब्बत का फिर, तुमसे भी होगा हिसाब।
फिर तुम कहोगे देवी जी! किताब तो मैंने बना ली
पर अंदर कागज कोरे है ये बात मैंने छुपा ली।
सारी स्याही मैंने जिल्द सजाने में लगा दी
और इस तरह अंदर लिखने वाली हर बात मैंने गंवा दी।
अब इस किताब की जिल्द देख सब लोग खींचे चले आते है
पर जिल्द खोलकर पढ़ने की जहमत नही उठाते है।
मैं भी खुश हूं चलो यहां सब जिल्द देखने वाली है
वैसे भी कोई क्या पढ़ेगा, किताब तो अंदर खाली है।
तुम जिल्द देखकर आयी , पर ठहर वहां नही पायी
तुमने किताब खोलनी चाही , पर हाथ लगी रुसवाई।
फिर बाते तुम्हारी सुनकर हम भी थोड़ा मुस्काएँगे
या अपने रस्ते जाएंगे या लिखने को कलम उठाएंगे।
मैं तुमसे प्यार कर ही लूँ चाहे तुम मुझ से कर ना पाओगे
फिर होगा यूँ इस बात से, हर बात पे लिखवाओगे ।
एक बात कहेंगे तुमसे कि चाहे तुम जिल्द सजाते हो,
जो बात समझ नही आती है , उसे अच्छे से समझाते हो।
-रचना

Friday, March 25, 2016

किताब

किताब... बस एक किताब, किताब जिसमे कागज़ बंधे है और कागज़ पे बिखरे है अक्षर.. तुम कभी सोच सकते हो इन अक्षरों में कितनी ताकत है ??
नहीं सोच पाओगे ! 
क्यों ?? 
क्युकी कभी पाला ही नहीं पड़ा !
क्युकी कभी पाला ही नहीं पड़ा किसी कहानी से .... कहनी जो तुम्हारी आत्मा तक को छू ले और तुम्हारी सुखी हुई आँखों को जल से भर दे , और तुम्हे समझा दे झटके में कि जीवन वही है जिसमे तुम मरते दम तक अपनी भावनाओ को बचा लो। 

नहीं सोच पाओगे क्युकी कभी पाला ही नहीं पड़ा किसी कविता से !
कविता जो तुम्हारी नींदे उड़ा दे और तुम्हारे संसार को आश्चर्य से भर दे कि अहा ! जीवन का ऐसा सुंदर रूप मैं पहले क्यों नहीं देख पाया और कविता जो तुमको प्रेम समझाए कि क्यों ऐसा होता है कि कोई प्रेम में पड़कर एक ही इंसान को हजारो -हजारो तरीके से समझता है और इंसान को समझते समझते वो एक दिन खुद को समझ जाता है और तब उसे समझ आता है कि प्रेम इसलिए है कि ईश्वर चाहता है तुम खुद को समझो और तब तुम इच्छा करो कि मेरा जीवन कविता बन जाए या मैं किसी के जीवन का कवि !!

नहीं सोच पाओगे .... क्युकी कभी पाला ही नहीं पड़ा किसी उपन्यास से !
ऐसी ऐसी  महगाथाये जिनमे जीवन के अनेको संघर्ष लिखे हुए है ठीक वही संघर्ष जो तुम कर रहे हो इस वक़्त, क्या पता कोई उपन्यास तुम्हारा ही जीवन हो और कोई पात्र तुम ही होओ. उस अचम्भे को कैसे समझ पाओगे कि कैसे लिखने वाले ने मेरे मन के हालातो का पता लगा लिया , नहीं समझ पाओगे क्युकी कभी पाला ही नहीं पड़ा। 
और मैं  कहती हूँ तुम्हारा पड़ना ही चाहिए , पड़ना ही चाहिए  इस जादू से। ... जो सपने बोता  है 
भावना को बड़ा करता है , दिलो को साफ़ करता है, मन को निखरता है और इंसान के रूप में तुम्हे इंसान सा बनता है। 

तुम ही कहो मुझे ....   
क्या इंसान एक आलिशान घर है ? क्या इंसान होना सिर्फ दो वक़्त तक सिमटने वाली बात होना है ?क्या इंसान रुपयों का जोड़ है? गहना है ? जमीन है ?..........  क्या है ???

नहीं ! इंसान ये सब नहीं है ये सब तो साधन है ,जीवन को सफल बनाने  में सहायक है पर जीवन इनमे नहीं बसता  है। 
इंसान तो धड़कते हुए दिल है ,इंसान बहती हुई भावना है। इंसान इसलिए है कि  वो खुद को समझे , ना कि  इसलिए है कि  वो घरों को समझे , पत्थरों को समझे , गहनों को समझे। 
पेट के लिए खाना जुटा  लिए ,
तन के लिए कपडा जुटा  लिए 

आत्मा के लिए क्या जुटा रहे हो , क्या जरुरत भी लगती है कि आत्मा को भी भोजन की जरुरत है ?
आत्मा का भोजन है विचार .... चिन्तन .... मंथन ....
और इन सब को पैदा करती है एक किताब !!!    

Wednesday, October 7, 2015

बात पे दो बात

मुझे सौ तरह से गुमान था
हर लफ्ज पे इत्मीनान था
मेरे ख्वाब में एक मकान था
उसमे खुला हुआ एक दालान था
थी सुर्ख सुबह से दोस्ती
हर शाम के संग संग मैं ढली
मुझ पे नींदे मेहरबान थी
सर पे ख्वाबो का आसमान था
मैं थी हवा के संग डोलती
तितलियो के कानो में थी बोलती
हर पेड़ की शाख से पहचान थी
पानी पे भी पैरो की छाप थी
वो गली के किनारो पे जो पेड़ था
जिसपे मीठे बेरो का ढेर था
उसे मुझ से कुछ ज्यादा प्यार था
मेरी झोली में बेरो का ढेर था.............

पर किसको ख्याल था.....
जिस वक़्त का मुझ पे अहसान था
उस वक़्त के हाथो में जाल था
फिर मैं सौ तरह से फंसाई गयी
सांस सांस के संग रुलाई गयी
हँसी हँसी में मैं यू उड़ाई गयी
बिखरे धान सी फिर ना उठाई गयी.

थक गया वक़्त फिर मुझ से क्या मांगता
खुद मेरे ही हक़ में दुआ माँगता............

Monday, September 14, 2015

सही जगह

ऐसा कभी नहीं था कि जिंदगी हम से नरमी से पेश आयी हो , बल्कि वो तो खुद जितनी सख्त है उस से भी दस गुना सख्ती से पेश आयी , पर हमने भी पत्थर जैसी सख्त जिंदगी को अपने सर पे बरसने देने कि बजाए अपने कदमो के नीचे बिछाया और अपनी राहो को पक्का व मजबूत कर लिया !
यक़ीनन जिंदगी खुश है क्युकी इसी काम में आने के लिए ही तो सख्त थी  सख्त है 
 शुक्रिया जिंदगी !!!!!!

सर पे चढ़ने का मौका हमने सिर्फ और सिर्फ प्रेम को दिया , बस एक प्रेम ही है जो हमारे सर चढ़ के बोल सकता है

कहते सुना है लोगो को कि - कहाँ की मोहब्बत , कैसी मोहब्बत इस कठोर जिंदगी के आगे मोहब्बत कुचली ही जाती है।  हम हैरान परेशान  जाइये जनाब कैसी बाते करते है !
जरुर आप कठोर जिंदगी को सर पे बरसने दे रहे होंगे , सर पे बिठा के चल रहे होंगे  तब तो मोहब्बत पैरो के नीचे कुचली ही जायेगी। आपकी जिंदगी पे मोहब्बत नहीं बरस रही ये आपकी नियति नहीं चुनाव है।  जगह बदल के देखिये जरा !!!

बाकी पत्थर जैसी जिंदगी राहो में बिछी हो और मोहब्बत सर पे चढ़ के नाच रही हो तो जिंदगी ने मुझे सम्भाल रखा है और मोहब्बत ने मुझे सँवार रखा है !!!!

कांटो सी मोहब्बत

आह ! कांटे !...... उनके पास से गुजरो तो दामन को पकड कर ऐसेखींचते है कि जैसे बरसो से हमारे ही इंतज़ार में खड़े थे कि जैसे अब आये हो अब तो ना जाने देंगे बहुत हिसाब लेने है ... बहुत सवाल करने है.... उलझ जाते है दामन में और दामन को भी उलझा लेते है.. बिना उन से उलझे अंजानो सा बेखबर गुजर जाना संभव नहीं...., कांटे ...उफ्फ् कैसे रोक लेते है ...जाने नही देते ...इतनी शिद्दत ...., 
मोहब्बत हो जाती है मुझे इन कांटो से...... और कांटे जैसे इंसान से.....फूलो पे कभी प्यार नहीं आता उन में इतना खिचांव नहीं की मेरे चलते हुए कदमो को रोक ले....पर कांटे कितने जिद्दी है 
अल्लाह ! मोहब्बत हो तो कांटो जैसी वर्ना हो ही ना ....
जब कांटो को दामन से अलग करती हु तो मै खूब रोती हु..... और मजाल भी बस उन्ही की है कि मुझे रुला दे.....( कोई समझेगा क्या राज़ ए गुलशन .... जब तक उलझे ऩा कांटो से दामन )

Monday, September 7, 2015

अब पर्दा गिराते है


तहे ... परते और एक के बाद एक किरदार बदलता चरित्र.... बहुत खूब !!!  मैं नन्ही सी जान और इतने सारे किरदार निभाने है और हर किरदार की तहो में  उतर कर उसकी आत्मा को छू के आना .... आहा!!!  हमे गर्व है हम अभिनेत्री है  और ये जीवन हमे जो किरदार देता है हम अपनी पूर्ण दक्षता से उसे छूकर गुजरते है , हालाँकि किरदारों के मोहपाश में तब तक ही रहते है जब तक हम उस किरदार को जी रहे होते है! अदभुत मायाजाल !
कहानी खत्म , किरदार ख़त्म ,जेहन में बची रही उसकी खुशबु  आखिर  यही खुशबू पाना ही तो था उद्देश्य , हम अपनी आत्मा में महक लिए ढेरो किरदारों की जीते चले जा रहे है

पर्दा उठने वाला है ...हम तैयार है ..डूबने को... तैरने को...हँसने को... रोने को... ये वो वक़्त है जब हम में किरदार उतरेगा... और हम किरदार हो जाएँगे...

अबकी बार मुझे जुआ खेलना अच्छे से आना चाहिए , अंतिम दांव के अंतिम क्षण  के पहले वाले क्षण तक यही लगे कि मै  हार रही हूँ  और फिर.......
हालांकि मैं जीत गयी तो जीत के मैं बहुत उदास होऊंगी, क्योंकि मै जानती हूँ हार ही नियत हैं, नियति है, 
ये जानकार भी कि हार ही होगी, मै हर दांव खेलूंगी अंतिम हार तक!!!   जैसे सारी हार- जीत कायनात ने मेरे लिए ही रख छोड़ी हो !!
              
                        "" ये बड़ी प्रतिस्पर्धा है ""  

 गहरी भी है और दोहरी भी हैं जिस से है वो शक्ती भी देती है हथियार भी देती है और विरुद्ध खड़ी होके मात भी देती हैं, और हार को जानकर भी जो मैं खेल रही हूँ उसपे मुग्ध होते हुए अभिमान भी देती है....

Saturday, August 8, 2015

प्रेम की दो बात

उफ्फ !!! मै  कैसा महसुस  करती हूँ ??
मै  कहती हूँ कि  मै  बहरी हूँ… इसका मतलब ये नहीं कि  मुझे कुछ सुनाई नहीं पड़ता … इसका मतलब ये है कि मै पल पल इतनी चीखो से घिरी हुई हूँ कि उनके सामने सिर्फ बहरा ही हुआ जा सकता है ....... 
सिर्फ मेरे "बहरी हूँ ' कहने भर से क्या तुम समझोगे कि मै कैसा महसूस करती हूँ…… पर कहूँगी मै इतना ही, ये तय है। 

ओह ! तुम, जो कहते हो कि मुझ से प्रेम करते हो …… तुम सुनो कि मुझ से प्रेम करने से पहले तुम्हे ये जानना होगा कि मै कैसा महसूस करती हूँ वरना तो तुम मुझे एक कठोर ह्रदय से ज्यादा कुछ नहीं समझोगे।
               
                      तुम्हे अपनी आत्मा तक को जिन्दगी कि कड़ी धुप में सूखने देना होगा ……, इतना सूखने देना होगा कि वो जरा सी चोट से कड़- कड़ करके टूट जाए , समय कि चक्की में उसे निर्दयता पूर्वक  महीन -महीन 
पिसने देना होग ……  और फिर अचानक ही सांस कि हवा से उस के कण कण को बिखर जाने देना होगा .......  
और !! उसके बाद गुजारते रहना अपना पूरा जीवन ....... और कितने जीवन उस के कण कण को इक्कठा करते रहने में , जबकि तुम अच्छी तरह से जानते हो कि तुमने अपनी आत्मा के साथ ये सब " हो जाने दिया ". 

अब समझो मै कैसा महसूस करती हूँ.…, यही मेरी जिन्दगी है , मुझे हर पल लगता है मेरी जिन्दगी एक शून्य के अलावा कुछ भी नहीं , जहाँ से शुरु हुई अंत वही पे होगा …  एक निरर्थक बक - झक !
ओह ! फिर भी मै दौड़ती  तो हूँ  ही , कभी इस अंश के पीछे , कभी उस अंश के पीछे !!!

और तभी तुम आकर मुझ से कहोगे  कि तुम्हे मुझ से प्रेम है.......  तो तुम्हे क्या लगता है  कि मै तुम्हारी इस प्रेम से हरी - भरी आत्मा  को देखकर  इसकी छाँव में आराम करने का सोचूंगी ……, नहीं ! हरगिज नहीं !
बल्कि मै विरक्त भाव से गुजर जाउंगी। 

और तुम !!! सुनो … हाँ तुम  जिस पर मुझे प्रेम आ जाता है , तुम जिसे देखते ही महसूस हो जाता है कि तुम कैसा महसूस करते हो ....... ,  और मेरा यही विचार कि काश ! हम अपनी अपनी आत्मा के अंशो कि खोज साथ साथ करे .......  यही साथ का विचार ही मेरा तुम्हारे प्रति प्रेम है।  ना तो तुम निश्चित जानते हो  कि तुम्हारे हिस्से कहां उड़ गये ,ना तो मै .......  पर इतना जरुर लगता है कि आत्मा के वो दोनों हिस्सों को जो हवा उड़ा  उड़ा ले गयी , एक ही दिशा  की ओर गयी थी। 

मैंने कही सुना था निरर्थक जीवन को अर्थ प्रेम देता है , तो इस पाए हुए को खोना और ढूँढ के फिर से पाने  -खोने  के निरर्थक जीवन में साथ का ही अर्थ मालुम होता है।  ये साथ ही प्रेम है।