Sunday, January 23, 2022
कहानी का जीवन.
Saturday, July 10, 2021
अगर नहीं पता कि पहुंचना कहाँ है तो सब ठीक है
Sunday, May 16, 2021
शुरू से शुरू करते है ...
Friday, September 13, 2019
मैं तुमसे प्यार कर भी लूं, तुम मुझ से कर ना पाओगे.
मैं तुम से प्यार कर भी लूं, तुम मुझ से कर ना पाओगे
फिर होगा यूँ इस बात से , हर बात पे रुलाओगे
मैं तुमसे प्यार करके तुम्हारी आँखों मे झांकूँगी
वहां गहराइयां ना पाके फिर खुद ही को डाँटूंगी
मैं खुद से कहूंगी, ले बता अब कहाँ मैं डूब मरूँ
और अगर जीती रही तो तुमसे प्यार क्यूँ करूँ।
कि मैंने सुना है इश्क़ में तो डूब जाना होता है
खुद को फ़ना करके ही फिर खुद को पाना होता है।
मैं तुमसे प्यार कर भी लूं...... फिर होगा यूँ.........
मैं तुमसे प्यार करके तुम्हारे चेहरे को बांचूंगी
और सीधी कही बात को भी,उलट- पुलट कर जांचूंगी
तेरे आते - जाते भावो में, तेरी रूह के दरवाजे ढूंढूंगी
और बंद दरवाजो से टकरा कर ,फिर खुद ही को मैं कोसूंगी
खुद से कहूंगी ले बता, ये रूह तो दरवाजो के पीछे मौन है
अब किस से प्यार मैं करूँ, यहां मेरा अपना कौन है
कि मैंने सुना है इश्क़ में रूह , रूह को बुलाती है
एक रूह की सदा दूजी को छू के जाती है।
मैं तुमसे प्यार कर भी लूं...... फिर होगा यूँ........
मेरी बातों को सुनके तुम थोड़ा सा मुस्काओगे
और सुकूँ से बैठ कर मुझे हौले से समझाओगे।
अजी छोड़िये भी अब,तुम्हारे ये रूहानी किस्से
ऐसी मोहब्बत रह गयी है,सिर्फ किताबो के हिस्से।
ये बात सुनकर मैं फिर अंदर तक हिल जाउंगी
तुम कह रहे हो ये बात , यकीं नही कर पाउंगी।
तुमसे कहूंगी तो फिर, बन क्यों नही जाते हो किताब
ऐसी मोहब्बत का फिर, तुमसे भी होगा हिसाब।
फिर तुम कहोगे देवी जी! किताब तो मैंने बना ली
पर अंदर कागज कोरे है ये बात मैंने छुपा ली।
सारी स्याही मैंने जिल्द सजाने में लगा दी
और इस तरह अंदर लिखने वाली हर बात मैंने गंवा दी।
अब इस किताब की जिल्द देख सब लोग खींचे चले आते है
पर जिल्द खोलकर पढ़ने की जहमत नही उठाते है।
मैं भी खुश हूं चलो यहां सब जिल्द देखने वाली है
वैसे भी कोई क्या पढ़ेगा, किताब तो अंदर खाली है।
तुम जिल्द देखकर आयी , पर ठहर वहां नही पायी
तुमने किताब खोलनी चाही , पर हाथ लगी रुसवाई।
फिर बाते तुम्हारी सुनकर हम भी थोड़ा मुस्काएँगे
या अपने रस्ते जाएंगे या लिखने को कलम उठाएंगे।
मैं तुमसे प्यार कर ही लूँ चाहे तुम मुझ से कर ना पाओगे
फिर होगा यूँ इस बात से, हर बात पे लिखवाओगे ।
एक बात कहेंगे तुमसे कि चाहे तुम जिल्द सजाते हो,
जो बात समझ नही आती है , उसे अच्छे से समझाते हो।
-रचना
Friday, August 23, 2019
Wednesday, August 14, 2019
Friday, September 7, 2018
Friday, March 25, 2016
किताब
नहीं सोच पाओगे .... क्युकी कभी पाला ही नहीं पड़ा किसी उपन्यास से !
Wednesday, October 7, 2015
बात पे दो बात
मुझे सौ तरह से गुमान था
हर लफ्ज पे इत्मीनान था
मेरे ख्वाब में एक मकान था
उसमे खुला हुआ एक दालान था
थी सुर्ख सुबह से दोस्ती
हर शाम के संग संग मैं ढली
मुझ पे नींदे मेहरबान थी
सर पे ख्वाबो का आसमान था
मैं थी हवा के संग डोलती
तितलियो के कानो में थी बोलती
हर पेड़ की शाख से पहचान थी
पानी पे भी पैरो की छाप थी
वो गली के किनारो पे जो पेड़ था
जिसपे मीठे बेरो का ढेर था
उसे मुझ से कुछ ज्यादा प्यार था
मेरी झोली में बेरो का ढेर था.............
पर किसको ख्याल था.....
जिस वक़्त का मुझ पे अहसान था
उस वक़्त के हाथो में जाल था
फिर मैं सौ तरह से फंसाई गयी
सांस सांस के संग रुलाई गयी
हँसी हँसी में मैं यू उड़ाई गयी
बिखरे धान सी फिर ना उठाई गयी.
थक गया वक़्त फिर मुझ से क्या मांगता
खुद मेरे ही हक़ में दुआ माँगता............
Monday, September 14, 2015
सही जगह
कांटो सी मोहब्बत
मोहब्बत हो जाती है मुझे इन कांटो से...... और कांटे जैसे इंसान से.....फूलो पे कभी प्यार नहीं आता उन में इतना खिचांव नहीं की मेरे चलते हुए कदमो को रोक ले....पर कांटे कितने जिद्दी है
अल्लाह ! मोहब्बत हो तो कांटो जैसी वर्ना हो ही ना ....
जब कांटो को दामन से अलग करती हु तो मै खूब रोती हु..... और मजाल भी बस उन्ही की है कि मुझे रुला दे.....( कोई समझेगा क्या राज़ ए गुलशन .... जब तक उलझे ऩा कांटो से दामन )









